दरख़्त

दरख़्तों से फिसलती रौशनी इनायत सी है कुदरत की | थोडीसी धूप थोडीसी छाँव रिवायत सी है हयात की |

नैन

न जाने ऐसा क्या समाए ये नैन है। होठों पे यूँही मुस्कान भर जाते है।

वजूद

सदियों से हूँ ढूंढता आखिर क्या वजूद हैं मेरा। गुम सा गया हूँ कही आखिर क्या कसूर हैं मेरा।

इत्र

इत्र सी महकती हो तुम कभी कभी तुम खुद इत्र बन जाती हो। महक उठता है हर वोह शख्स जिसके करीब मात्र से तुम गुजरती हो।

गलियां

गलियों से जो हर वक्त गुजरता हूँ इन, खयालों की वारदात शुरू हो जाए कही | चाहे न हो कोई सूरत आंखों में किसी की, मन तो अकसर ही ढुंढे कोई अनामिक |

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